राजस्थान में पशुपालन

पशुपालन
-    पशुपालन में राजस्थान का दूसरा स्थान हैं। प्रथम स्थान उत्तरप्रदेष का हैं।
-    भेड़े सर्वांधक राजस्थान में हैं।
-    बकरियों में राजस्थान का दूसरा स्थान हैं। पहला स्थान पष्चिम बंगाल का हैं।
-    ऊँट में पहला स्थान हैं।
-    भेड़ों की नस्ल:-
>    राजस्थान में भारत का 41.6 % ऊन उत्पादन होता हैं।
-    भेड़ों की नस्ले निम्नलिखित हैं:-
> पूगल नस्ल:- सर्वांधिक बीकानेर में हैं।
- चोकला/शेखाती/छापर/मैरीनों:-
>यह सर्वाधिक शेखाटी बीकानेर क्षेत्र में पायी जाती हैं।
>इसकी ऊन सर्वोत्तम किस्म की हैं।
- नाली नस्ल:-
>यह हनुमानगढ़, गंगानगर, बीकानेर में पाली जाती हैं। सर्वांधिक हनुमानगढ़ में पाली जाती हैं।
>हनुमानगढ़ में घग्घर को नाली कहते हैं।
 जैसलमेरी नस्ल:-
>यह जैसलमेर, बाड़मेर जोधपुर में सर्वांधिक पाली जाती हैं।
>यह सर्वांधिक ऊन देने वाली भेड़ हैं। इससे 3 से 3.5 किलों ऊन प्राप्त होती हैं।
- मारवाड़ी नस्ल:-
>राजस्थान में सर्वांधिक पाली जाने वाली नस्ल, जो राजस्थन की कुल भेड़ों का लगभग 50 % हैं।
>यह राजस्थान की मूल और प्राचीनतम नस्ल हैं जो जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, पाली, सिरोही (मारवाड़  क्षेत्र) में सर्वांधिक पायी जाती हैं।
>इसकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता सर्वांधिक हैं।
>दक्षिणी-पष्चिमी क्षेत्र में रेबारी जाति के लोगों के पास सर्वांधिक पाली जाती हैं।
>अकाल के दौरान इन भेड़ो को लेकर रेबारी मालवा क्षेत्र में जाते हैं। जिसे स्थानीय भाषा में डांग जाना कहते हैं।
-    भावली (भाऔली):-
> किसान द्वारा किसी ओर के खेत को ठेके पर लेकर कृषि कार्य करना भावली कहलाता है।
> हाली:- बन्धुआ मजदूर जिसे काम का पूरा खर्च मिलता हैं।
सोनाड़ी नस्ल (चनोथर):-
>राजस्थान के दक्षिणी-पूर्वी भाग में (चुनोथर) कोटा, बूंदी, झालावाड़ क्षेत्र में पाली जाती हैं।
मालपुरी नस्ल:-
> टोंक, जयपुर, अजमेर, सवांईमाधोपुर क्षेत्र में पाली जाती हैं। यह सर्वांधिक जयपुर में पाली जाती हैं।
>टोंक के मालपुरा के अविकानगर में केन्द्रीय भेड़ प्रजनन केन्द्र स्थित हैं। जो भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के द्वारा संचालित हैं।
> इस संस्थान में पष्चिमी क्षेत्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान का क्षेत्रीय केन्द्र भी हैं।
-मगरा नस्ल:- यह बीकानेर, जोधपुर नागौर में सर्वांधिक पाई जाती हैं।
 गायों की नस्ल:-
-  गिर:-
इसकी उत्पति गुजरात के सौराष्ट्र से हुई हैं।
यह दक्षिण राजस्थान में उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा में पायी जाती हैं। इसे रेड़ा कहते हैं। अजमेर में इसे अजमेरा कहते हैं।
-  राठी:-
> यह उत्तर-पष्चिम राजस्थान में पायी जाती हैं।
> लाल सिंधी और साहीवाल नस्ल की संकर नस्ल हैं।
> इसे कामधेनू भी कहते हैं।
> राजस्थान के उत्तर में गंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर में सर्वांधिक पाली जाती हैं।
> डेयरी उद्योग के लिए सर्वांधिक उपयुक्त हैं।
> उत्तर-पष्चिमी सीमावर्ती जिलों में पाई जाती हैं।
-    थारपारकर:-
> यह राजस्थान के पष्चिमी क्षेत्र में पाई जाती हैं।
> इसकी उत्पति जैसलमेर के पलानी गांव से हुई हैं।
> राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्र में सर्वांधिक पाई जाती हैं।
> जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर में पाई जाती हैं। सर्वांधिक जैसलमेर में पाली जती हैं।
> यह डेयरी उद्योग के लिए पाली जाती हैं।
-    संचोरी नस्ल (कांकरेच):-
> इसका उत्पति स्थल जालौर माना जाता है।
> जालौर, सिरोही, बाड़मेर, पाल में सर्वांधिक पाई जाती हैं।
> राजस्थान के दक्षिण-पष्चिम में पाई जाती हैं।
-    मालवी नस्ल:-
>यह राजस्थान के दक्षिण में पाई जाती हैं।
> डूंगरपुर  , बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़ झालावाड़ के सीमावर्ती क्षेत्रों में पायी जाती हैं।
-    नागौरी नस्ल:-
> इसका उत्पति स्थल नागौर के श्वालक क्षेत्र से माना जाता हैं।
> इस नस्ल के बैल सर्वांधिक उपयोगी होते हैं, गाय नहीं।
-    हरियाणवी नस्ल:-
> यह हरियाणा राजस्थान के सीमावर्ती जिलों में पायी जाती हैं।
> चुरू, झुन्झुनू, सीकर, जयपुर  अलवर में पायी जाती हैं।
> डेयरी उद्योग के लिए राठी और थारपारकर सर्वांधि उपयुक्त है।
-    द्विप्रयोजनीय:- कांकरेज, गिर (दूध, बैल)
>    केवल बैल के लिए नागौरी सर्वांधिक उपयुक्त हैं।
-    बकरी:-
-    जमुनापुरी (जमुनापारी):-
> सर्वांधिक दूध देने वाल बकरी
> इसे गरीब की गाय कहते हैं।
> राजस्थान के उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र में सर्वांधिक पाली जाती हैं।
-    सिरोही, लोही:- ये मांस के लिए पाली जाती हैं।
-    झरबरी नस्ल:- ये दूध के लिए पाली जाती हैं।
-    अलवरी:-
>सर्वांधिक अलवर के बहरोड़ तहसील में पाई जाती हैं, जिसे झखराना  भी कहते हैं।
> यह घास, चारा, पाला, पत्तियां नहीं खाती हैं।
> घर में शेष बचा भोज्य पदार्थ खाती हैं।
> बकरी चारा अनुसंधान संस्थान रामसर (अजमेर) में स्थित हैं। यह राज्य सरकार द्वारा संचालित है।


राजस्थान में पशुपालन

पशुपालन
-    पशुपालन में राजस्थान का दूसरा स्थान हैं। प्रथम स्थान उत्तरप्रदेष का हैं।
-    भेड़े सर्वांधक राजस्थान में हैं।
-    बकरियों में राजस्थान का दूसरा स्थान हैं। पहला स्थान पष्चिम बंगाल का हैं।
-    ऊँट में पहला स्थान हैं।
-    भेड़ों की नस्ल:-
>    राजस्थान में भारत का 41.6 % ऊन उत्पादन होता हैं।
-    भेड़ों की नस्ले निम्नलिखित हैं:-
> पूगल नस्ल:- सर्वांधिक बीकानेर में हैं।
- चोकला/शेखाती/छापर/मैरीनों:-
>यह सर्वाधिक शेखाटी बीकानेर क्षेत्र में पायी जाती हैं।
>इसकी ऊन सर्वोत्तम किस्म की हैं।
- नाली नस्ल:-
>यह हनुमानगढ़, गंगानगर, बीकानेर में पाली जाती हैं। सर्वांधिक हनुमानगढ़ में पाली जाती हैं।
>हनुमानगढ़ में घग्घर को नाली कहते हैं।
 जैसलमेरी नस्ल:-
>यह जैसलमेर, बाड़मेर जोधपुर में सर्वांधिक पाली जाती हैं।
>यह सर्वांधिक ऊन देने वाली भेड़ हैं। इससे 3 से 3.5 किलों ऊन प्राप्त होती हैं।
- मारवाड़ी नस्ल:-
>राजस्थान में सर्वांधिक पाली जाने वाली नस्ल, जो राजस्थन की कुल भेड़ों का लगभग 50 % हैं।
>यह राजस्थान की मूल और प्राचीनतम नस्ल हैं जो जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, पाली, सिरोही (मारवाड़  क्षेत्र) में सर्वांधिक पायी जाती हैं।
>इसकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता सर्वांधिक हैं।
>दक्षिणी-पष्चिमी क्षेत्र में रेबारी जाति के लोगों के पास सर्वांधिक पाली जाती हैं।
>अकाल के दौरान इन भेड़ो को लेकर रेबारी मालवा क्षेत्र में जाते हैं। जिसे स्थानीय भाषा में डांग जाना कहते हैं।
-    भावली (भाऔली):-
> किसान द्वारा किसी ओर के खेत को ठेके पर लेकर कृषि कार्य करना भावली कहलाता है।
> हाली:- बन्धुआ मजदूर जिसे काम का पूरा खर्च मिलता हैं।
सोनाड़ी नस्ल (चनोथर):-
>राजस्थान के दक्षिणी-पूर्वी भाग में (चुनोथर) कोटा, बूंदी, झालावाड़ क्षेत्र में पाली जाती हैं।
मालपुरी नस्ल:-
> टोंक, जयपुर, अजमेर, सवांईमाधोपुर क्षेत्र में पाली जाती हैं। यह सर्वांधिक जयपुर में पाली जाती हैं।
>टोंक के मालपुरा के अविकानगर में केन्द्रीय भेड़ प्रजनन केन्द्र स्थित हैं। जो भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के द्वारा संचालित हैं।
> इस संस्थान में पष्चिमी क्षेत्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान का क्षेत्रीय केन्द्र भी हैं।
-मगरा नस्ल:- यह बीकानेर, जोधपुर नागौर में सर्वांधिक पाई जाती हैं।
 गायों की नस्ल:-
-  गिर:-
इसकी उत्पति गुजरात के सौराष्ट्र से हुई हैं।
यह दक्षिण राजस्थान में उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा में पायी जाती हैं। इसे रेड़ा कहते हैं। अजमेर में इसे अजमेरा कहते हैं।
-  राठी:-
> यह उत्तर-पष्चिम राजस्थान में पायी जाती हैं।
> लाल सिंधी और साहीवाल नस्ल की संकर नस्ल हैं।
> इसे कामधेनू भी कहते हैं।
> राजस्थान के उत्तर में गंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर में सर्वांधिक पाली जाती हैं।
> डेयरी उद्योग के लिए सर्वांधिक उपयुक्त हैं।
> उत्तर-पष्चिमी सीमावर्ती जिलों में पाई जाती हैं।
-    थारपारकर:-
> यह राजस्थान के पष्चिमी क्षेत्र में पाई जाती हैं।
> इसकी उत्पति जैसलमेर के पलानी गांव से हुई हैं।
> राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्र में सर्वांधिक पाई जाती हैं।
> जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर में पाई जाती हैं। सर्वांधिक जैसलमेर में पाली जती हैं।
> यह डेयरी उद्योग के लिए पाली जाती हैं।
-    संचोरी नस्ल (कांकरेच):-
> इसका उत्पति स्थल जालौर माना जाता है।
> जालौर, सिरोही, बाड़मेर, पाल में सर्वांधिक पाई जाती हैं।
> राजस्थान के दक्षिण-पष्चिम में पाई जाती हैं।
-    मालवी नस्ल:-
>यह राजस्थान के दक्षिण में पाई जाती हैं।
> डूंगरपुर  , बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़ झालावाड़ के सीमावर्ती क्षेत्रों में पायी जाती हैं।
-    नागौरी नस्ल:-
> इसका उत्पति स्थल नागौर के श्वालक क्षेत्र से माना जाता हैं।
> इस नस्ल के बैल सर्वांधिक उपयोगी होते हैं, गाय नहीं।
-    हरियाणवी नस्ल:-
> यह हरियाणा राजस्थान के सीमावर्ती जिलों में पायी जाती हैं।
> चुरू, झुन्झुनू, सीकर, जयपुर  अलवर में पायी जाती हैं।
> डेयरी उद्योग के लिए राठी और थारपारकर सर्वांधि उपयुक्त है।
-    द्विप्रयोजनीय:- कांकरेज, गिर (दूध, बैल)
>    केवल बैल के लिए नागौरी सर्वांधिक उपयुक्त हैं।
-    बकरी:-
-    जमुनापुरी (जमुनापारी):-
> सर्वांधिक दूध देने वाल बकरी
> इसे गरीब की गाय कहते हैं।
> राजस्थान के उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र में सर्वांधिक पाली जाती हैं।
-    सिरोही, लोही:- ये मांस के लिए पाली जाती हैं।
-    झरबरी नस्ल:- ये दूध के लिए पाली जाती हैं।
-    अलवरी:-
>सर्वांधिक अलवर के बहरोड़ तहसील में पाई जाती हैं, जिसे झखराना  भी कहते हैं।
> यह घास, चारा, पाला, पत्तियां नहीं खाती हैं।
> घर में शेष बचा भोज्य पदार्थ खाती हैं।
> बकरी चारा अनुसंधान संस्थान रामसर (अजमेर) में स्थित हैं। यह राज्य सरकार द्वारा संचालित है।