राजस्थान की प्रमुख लोक देवियां / लोक देवता

राजस्थान के लोक देवता
गोगाजी (गोगा बप्पा) (11 वीं शताब्दी):-
  • चैहान वंषीय राजपूत, जन्म स्थान चुरू का ददरेवा गांव में हुआ।
  • पिता जेवरसिंह एवं माता बाछल देवी।
  • लगभग 1103 . सन् में मेहमूद गजनवी से गायों की रक्षा करते हुए वीरगती को प्राप्त हुए।
  • गजनवी ने इन्हें ‘‘जाहरपीर’’ की संज्ञा दी।
  • इन्हे सांपो के देवता के नाम से जाना जाता हैं।
  • किसानों के द्वारा पहली बार हल जोतने पर हल और हाली को इनके नाम की राखी बांधी जाती हैं जिसे ‘‘गोगाराखड़ी’’ कहते हैं।
  • इनका थान खेजड़ी के वृक्ष के नीचे होता है।
  • इनका मेला भाद्रपद कृष्णपक्ष की नवमी को गोगामेड़ी में भरता हैं।
  • इनका प्रतीक चिन्ह नीली घोड़ी है।
  • गोगाजी की ओल्ड़ी जालौर (सांचैर) में हैं।
  • गोगाजी के अन्य मन्दिर:- गुजरात, राजस्थान, पंजाब एवं हरियाणा में हैं।
  • धूरमेड़ी:- गोगाजी का समाधिस्थल जो गोगामेड़ी (हनुमानगढ़) में स्थित हैं।
  • शीर्षमेड़ी:- गोगाजी का जन्मस्थान जो ददरेवा में स्थित हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
तेजाजी:-
  • यह नागवंषीय जाट।
  • जन्मस्थान खड़नाल (नागौर)
  • पिता ताहड़जी एवं माता राजकुंवर।
  • तेजाजी ने लाखा गुर्जरी की गायों को मेरों से मुक्त करवाया।
  • इनके भोपे घोड़ले कहलाते हैं, जो सर्पदंष का इलाज करते हैं।
  • इनका मेला भाद्रभद शुक्ल दषमी को लगता हैं। यह मुख्यतः अजमेर के लोकदेवता हैं।
  • इनके मन्दिर सुरसुरा (अजमेर), ब्यावर, सेंदरिया (अजमेर) में हैं।
  • इनका मेला परबतसर (नागौर) में भरता हैं।
  • यह आय की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा पशु मेला हैं।
  • इनकी घोड़ी का नाम लीलण (सिणगारी) हैें।
  • इनकी गिनती पंच पीरों में नही होती हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
रामदेवजी (1462 वि. सवंत् से 1515 वि. संवत्):-
  • यह तंवर राजपूत जाति से थे।
  • जन्मस्थान बाड़मेर के षिव तहसील के उड़काष्मेर नामक स्थान पर हुआ।
  • पिता का नाम अजमालजी एवं माता का नाम मैणादे।
  • पत्नी का नाम नेतलदे।
  • जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष की द्वितीया को एवं भाद्रपद शुक्ल एकादषी को रूणीचा में समाधि ली।
  • इन्हें विष्णु का अवतार माना जाता हैं।
  • इन्हें रामसापीर के नाम से भी जानते हैं।
  • इन्हे साम्प्रदायिक सद्भावना एवं एकता के देवता के रूप में जाना जाता हैं।
  • ऊँच-नीच छुआ-छूत के विरोधी और सामाजिक समरसता के प्रतीके रूप में पूज्य क्योंकि इन्हें सभी जातियों के द्वारा पूजा जाता हैं।
  • इनके द्वारा अछूतो को पुनःस्थापित करने के लिए ‘‘कामड़िया संप्रदाय’’ की स्थापना की गई।
  • इस संप्रदाय की महिलाओं के द्वारा रामदेवजी के मेले के अवसर पर तेरहताली नृत्य किया जाता हैं।
  • इनके गुरू बालीनाथ थे।
  • इनके ‘‘पगल्ये’’ पूजे जाते हैंे।
  • इनके रात्री जागरण को ‘‘जम्मा’’ कहते हैं।
  • इनकी ध्वजा नेजा कहलाती हैं, जो सफेद और पचरंगी होती हैं।
  • ये राजस्थान के एकमात्र देवता थे जो साहित्यकार भी हैं।
  • इन्होने ‘‘24 बाणियां’’ (सामाजिक बुराईयों पर) नामक पुस्तक लिखि थी।
  • इनके भक्त रखियां कहलाते हैं।
  • इनका मेला भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वितीया से दषमी तक भरता हैं।
  • इनके प्रसिद्ध मन्दिर रूणीचा (जैसलमेर), मसुरिया (जोधपुर), बिराटियां (अजमेर), सुरताखेड़ा (चित्तौड़गढ़), छोटा रामदेवरा (गुजरात) हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
पाबुजी:-
  • जन्म 1341 विक्रम सम्वत् मंे फलौदी के कोलूमंड़ गांव में हुआ।
  • ये राठौड़ वंष के थे।
  • माता का नाम कमलादे एवं पिता का नाम धांधल।
  • पत्नी का नाम सुप्यारदे।
  • देवल चारणी की गायों को अपने बहनोई जिंदराज खींची से बचातें हुए प्राण त्यागे।
  • देवल चारणी ने अपनी घोड़ी केसर कालमी पाबूजी को दी थी। चांदा, डेमा और हरमल पाबूजी के सहयोगी थे।
  • पाबुजी को लक्ष्मण का अवतार मानते हैं।
  • इनके जन्म मृत्यु के दिन लोकगाथा ‘‘पाबुजी के पावड़े’’ गाये जाते हैं।
  • रेबारी (राइका, नाइक, थोरी) जाति के अराध्य देवता हैं।
  • प्रमुख पुस्तक ‘‘पाबु प्रकाष’’ हैं। इसके लेखक ‘‘आंसिया मोड़जी’’ हैं।
  • पाबूजी की फड़ सर्वांधिक लोकप्रिय फड़ हैं।
  • इसकी मूल प्रतिलिपि वर्तमान में जर्मनी के संग्रहालय में रखी हुई हैं।
  • फड़ गाते समय रावणहत्था बजाया जाता हैं।
  • मेला चैत्र अमावस्या को भरता हैं।
  • पाबूजी प्लेग और ऊँटो के रक्षक देवता के रूप में पूजे जाते हैं, क्योंकि जब भी ऊँट बीमार होता हैं तब इनकी फड़ बांची जाती हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
हड़बुजी:-
  • जन्म नागौर के भूड़ेल गांव में हुआ। पिता का नाम मेहाजी सांखला।
  • इनका कार्यस्थल बैगंटी रहा। इनकी गाड़ी की पूजा की जाती हैं।
  • क्योंकि यह बैलगाड़ी से लावारिस पशुओं के लिए चारा लाते थे।
  • हड़बुजी रामदेवजी के मौसेरे भाई थे।
  • इन्होने रामदेवजी के समाज-सुधार के कार्यों को पूरा करने का प्रयास किया था।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
देवनारायण जी:-
  • जन्म स्थान भीलवाड़ा के आंसिद गांव में सम्वत् 1300 में हुआ।
  • पिताजी संवाई भोज एवं माता सेडू खटाणी।
  • यह गुर्जर बगड़ावत वंष के थे।
  • बचपन का नाम उदयसिंह।
  • पत्नी पीपलदे, जो मध्यप्रदेष के धार के शासक जयसिंह की पुत्री थी।
  • विष्णु का अवतार माना जाता हैं।
  • इनकी फड़ सबसे लम्बी हैं जो 35 5 हैं।
  • इनकी फड़ पर भारत सरकार के द्वारा 5 रु का टिकट भी जारी किया जा चुका हैें।
  • भाद्र शुक्ल छठ और सप्तमी को मेला भरता हैं।
  • इनका प्रमुख मंदिर आंसिद (भीलवाड़ा), देवधाम जोधपुरिया (टोंक), देवडूंगरी (चित्तौड़गढ़) और देवमाली (ब्यावर) में हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
मेहाजी:-
  • मारवाड़ के लोकदेवता।
  • मांगलिया (राजपूत) जाति के अराध्य देव हैं।
  • इन्हे पंचपीरों में गिना जाता हैं, घोड़ा किरड़ काबरा हैं।
  • इनका मेला जोधपुर के बापणी गांव में कृष्ण जन्माष्टमी को भरता हैं।
  • जैसलमेर के रांणगदेव से युद्ध करते हुए शहीद हुए।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
भूरिया बाबा:-
  • यह गोमतेष्वर के नाम से जाने जाते हैें।
  • यह मारवाड़ (गोड़वाड़) के मीणा जाति के आराध्य देव हैं।
  • दक्षिण राजस्थान के मीणा कभी भी इनकी झूठी कसम नहीं खाते हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
मल्लीनाथजी:-
  • जन्म 1358 . सन् में हुआ।
  • पिता का नाम तीड़ाजी एवं माता का नाम जाणीदेव।
  • इन्होने निजामुद्दीन की सेना को परास्त किया था।
  • इनका मेला चैत्र कृष्ण एकादषी से पन्द्रह दिन तक लूणी नदी के किनारे तिलवाड़ा (बाड़मेर) नामक स्थान पर पशु मेला भरता हैं।
  • यह मेला मल्लीनाथजी के राज्याभिषेक के अवसर से वर्तमान तक आयोजित हो रहा हैं।
  • बाड़मेर का गुड़ामलानी का नामकरण मल्लीनाथजी के नाम पर ही हुआ हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
कल्लाजी:-
  • इनका जन्म मेड़ता (सामियाना) में हुआ था।
  • मीराबाई इनकी बुआ थी।
  • चित्तौड़ के तीसरे शाके (1567) में मुगल अकबर की सेना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
  • यह चार हाथ वाले लोकदेवता हैें।
  • इनकी पूजा भूत-पिषाच से ग्रस्त व्यक्ति, पागल कुत्ते, विषैले नाग के काटने पर की जाती हैं।
  • इनकी मुख्य पीठ जालौर के रनैला गांव में हैं।
  • इन्हे शेषनाग का अवतार माना जाता हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
बिग्गाजी:-
  • जाखड़ समाज के इष्टदेव।
  • जन्म बीकानेर के रीढ़ी गांव में हुआ।
  • इन्होने मुस्लिम लुटेरों से गायों की रक्षा की।
  • डूंगरपुर के बिग्गा गांव में इनका मुख्य थान हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
झुंझारजी:-
  • इनका जन्म सीकर में हुआ था।
  • खेजड़ी के पेड़ के नीचे इनका निवास स्थान माना जाता हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
देवबाबा:-
  • इनका जन्म भरतपुर के नांगल गांव मंे हुआ था।
  • यह गुर्जर ग्वालों के अराध्य देव हैं।
  • इन्हे पशु चिकित्सा का अच्छा ज्ञान था।
  • इनका मेला भाद्रपद शुक्ल (सुदी) पंचमी एवं चैत्र सुदी पंचमी को भरता हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
मामादेव:-
  • मेवाड़ में बरसात के देवता के रूप में पूजे जाते हैं।
  • इनकी मूर्ति लकड़ी की होती हैं, जो मुख्य द्वार पर तोरण के रूप में एवं गांव के बाहर सड़क के किनारे रखी जाती हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
तल्लीनाथजी:-
  • यह राठौड़ वंषीय थे। इनका मुख्य मन्दिर पांचोटा पहाड़ी (जालौर) में पड़ता हैं।
  • इनके बचपन का नाम ‘‘गांग देव’’ था।
  • इनके गुरू जलन्धर ने इनका नाम तल्लीनाथ रखा था।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।

राजस्थान की प्रमुख लोक देवियां
करणी माता:-
  • यह बीकानेर के राठौड़ राजवंष की कुलदेवी हैं।
  • इनका मुख्य मन्दिर देषनोक में हैं।
  • यह ‘‘चूहों की देवी’’ के नाम से भी जानी जाती हैं।
  • चारण जाति (देपा) के लोग इनकी पूजा करते हैं।
  • चूहों को काबा कहते हैं।
  • मेला चैत्र अष्विन मास की शुक्ल एकम से नवमी तक भरता हैं।
जीणमाता:-
  • शाकम्भरी के चैहानों की कुल देवी हैं।
  • रेवासा गांव दांतारामगढ़ (सीकर) में अष्टभुजा रूपी प्रतिमा हैं।
  • मेला चैत्र अष्विन मास में भरता हैं।
  • नोट:- राजस्थान की लगभग सभी देवियों के मेले चैत्र या अष्विन मास
  • में भरते हैं।
शीतला माता:-
  • ‘‘सेढ़ल माता’’ एवं ‘‘चेचक की देवी’’ भी कहा जता हैं।
  • वाहन गधा हैं।
  • मन्दिर शीलडूंगरी की पहाड़ी, चाकसू (जयपुर) एवं संवाईमाधोपुर में हैें।
  • राजस्थान की एकमात्र देवी जो खंडित रूप में ूपजी जाती हैं।
  • बच्चों की संरक्षिका कहलाती हैं।
  • प्रतीक चिन्ह दीपक हैं।
  • पुजारी कुम्हार होते हैं।
  • मेला चैत्र कृष्ण पक्ष की सप्तमी एवं अष्टमी को भरता हैं।
कैलादेवी:-
  • करौली के यदुवंषियों की कुलदेवी हैं।
  • मुख्य मन्दिर करौली में त्रिकूट पर्वत पर हैें।
  • मेला चैत्र शुक्ल पक्ष की अष्टमी को भरता हैं।
  • भक्त इन्हें प्रसन्न करने के लिए लागुरियां नृत्य करते हैं।
  • मेले पर लाखों लोग आते हैं। इसलिए यह मेला लख्खी मेला कहलाता हैं।
षिलादेवी (अन्नपूर्णां देवी):-
  • यह जयुपर के कच्छावा राजवंष की कुलदेवी हैं।
  • इनकी मूर्ति आमरे शासक मानसिंह प्रथम पूर्वी बंगाल के विजय के दौरा महाराजा केदारनाथ से लाए थे।
  • 16 वीं. शताब्दी में इस मूर्ति को आमेर के राजभवन में स्थापित किया गया।
  • मूर्ति अष्टभुजी हैं।
आवड़माता:-
  • जैसलमेर के भाटी राजवंष की कुलदेवी हैंे।
  • मुख्यमन्दिर जैसलमेर के तेमड़ पर्वत पर हैं।
  • राजस्थान में ‘‘सुगनंचिड़ी’’ को आवड़ माता का रूप माना जाता हैं।
स्वांगिया माता:-
  • आवड़ माता का ही रूप हैं।
  • जैसलमेर के भाटी शासको की कुलदेवी हैं।
नागणेचीजी माता:-
  • जोधपुर के राठौड़ राजवंष की कुलदेवी हैं।
आवरी माता:-
  • इनका मंदिर चित्तौड़ में हैं
  • लकवे का इलाज करवाने वाले भक्त इनकी पूजा करते हैं।
नारायणी माता:-
  • मुख्य मंदिर अलवर में राजगढ़ तहसील के बरवा डूंगरी की पहाड़ी पर हैं।
  • मन्दिर प्रतिहार शैली में बना हुआ हैं।
  • मीणा जाति के लोग पुजारी हैं।
  • मीणा नाई जाति की विवादित देवी हैं।
ज्वाला माता:-
  • मंदिर जोबनेर में हैं।
  • यह खंगारोतो की कुल देवी हैं।
सच्चिया माता:-
  • ओसवाल समाज की कुल देवी हें।
  • मुख्य मंदिर ओंसिया (जोधपुर) में हैं।
  • यह मन्दिर प्रतिहार शैली में बना हैं।
  • मन्दिर नागभट्ट प्रथम द्वारा बनवाया गया।
तनोट माता:-
  • मुख्य मंदिर जैसलमेर के तनोट में हैं।
  • थार की वैष्णोंदेवी हैं।
  • सैनिकों की देवी हैं।
भदाणा माता:-
  • कोटा के हाड़ा शासकों की कुलदेवी हैं।
  • मूठ (तन्त्र-मन्त्र) की देवी हैं

अम्बिका माता:-
  • उदयपुर के जगत में मन्दिर हैं।
  • नोट:- जगत के मन्दिरों को मेवाड़ का खुजराहों कहा जात हैं।
बाणमाता:-
  • उदयपुर के सिसोदिया राजवंष की देवी है।
घेवरमाता:-
  • मन्दिर राजसमन्द है।
आषापुरी माता:-
  • जालौर के सोनगरा चैहानों की कुलदेवी है।
त्रिपुरा सुंदरी:-
  • मुख्य मंदिर बांसवाड़ा में हैं।
दधिमति माता:-
  • दाधीच ब्राह्यणों की कुलदेवी हैं।
  • मन्दिर गोठ मांगलोद (नागौर) में हैं।
चैथमाता:-
  • मुख्य मंदिर सवांईमाधोपुर में हैं।
सुगाली माता:-

  • आऊआ के ठाकुरों की कुलदेवी हैं।

राजस्थान की प्रमुख लोक देवियां / लोक देवता

राजस्थान के लोक देवता
गोगाजी (गोगा बप्पा) (11 वीं शताब्दी):-
  • चैहान वंषीय राजपूत, जन्म स्थान चुरू का ददरेवा गांव में हुआ।
  • पिता जेवरसिंह एवं माता बाछल देवी।
  • लगभग 1103 . सन् में मेहमूद गजनवी से गायों की रक्षा करते हुए वीरगती को प्राप्त हुए।
  • गजनवी ने इन्हें ‘‘जाहरपीर’’ की संज्ञा दी।
  • इन्हे सांपो के देवता के नाम से जाना जाता हैं।
  • किसानों के द्वारा पहली बार हल जोतने पर हल और हाली को इनके नाम की राखी बांधी जाती हैं जिसे ‘‘गोगाराखड़ी’’ कहते हैं।
  • इनका थान खेजड़ी के वृक्ष के नीचे होता है।
  • इनका मेला भाद्रपद कृष्णपक्ष की नवमी को गोगामेड़ी में भरता हैं।
  • इनका प्रतीक चिन्ह नीली घोड़ी है।
  • गोगाजी की ओल्ड़ी जालौर (सांचैर) में हैं।
  • गोगाजी के अन्य मन्दिर:- गुजरात, राजस्थान, पंजाब एवं हरियाणा में हैं।
  • धूरमेड़ी:- गोगाजी का समाधिस्थल जो गोगामेड़ी (हनुमानगढ़) में स्थित हैं।
  • शीर्षमेड़ी:- गोगाजी का जन्मस्थान जो ददरेवा में स्थित हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
तेजाजी:-
  • यह नागवंषीय जाट।
  • जन्मस्थान खड़नाल (नागौर)
  • पिता ताहड़जी एवं माता राजकुंवर।
  • तेजाजी ने लाखा गुर्जरी की गायों को मेरों से मुक्त करवाया।
  • इनके भोपे घोड़ले कहलाते हैं, जो सर्पदंष का इलाज करते हैं।
  • इनका मेला भाद्रभद शुक्ल दषमी को लगता हैं। यह मुख्यतः अजमेर के लोकदेवता हैं।
  • इनके मन्दिर सुरसुरा (अजमेर), ब्यावर, सेंदरिया (अजमेर) में हैं।
  • इनका मेला परबतसर (नागौर) में भरता हैं।
  • यह आय की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा पशु मेला हैं।
  • इनकी घोड़ी का नाम लीलण (सिणगारी) हैें।
  • इनकी गिनती पंच पीरों में नही होती हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
रामदेवजी (1462 वि. सवंत् से 1515 वि. संवत्):-
  • यह तंवर राजपूत जाति से थे।
  • जन्मस्थान बाड़मेर के षिव तहसील के उड़काष्मेर नामक स्थान पर हुआ।
  • पिता का नाम अजमालजी एवं माता का नाम मैणादे।
  • पत्नी का नाम नेतलदे।
  • जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष की द्वितीया को एवं भाद्रपद शुक्ल एकादषी को रूणीचा में समाधि ली।
  • इन्हें विष्णु का अवतार माना जाता हैं।
  • इन्हें रामसापीर के नाम से भी जानते हैं।
  • इन्हे साम्प्रदायिक सद्भावना एवं एकता के देवता के रूप में जाना जाता हैं।
  • ऊँच-नीच छुआ-छूत के विरोधी और सामाजिक समरसता के प्रतीके रूप में पूज्य क्योंकि इन्हें सभी जातियों के द्वारा पूजा जाता हैं।
  • इनके द्वारा अछूतो को पुनःस्थापित करने के लिए ‘‘कामड़िया संप्रदाय’’ की स्थापना की गई।
  • इस संप्रदाय की महिलाओं के द्वारा रामदेवजी के मेले के अवसर पर तेरहताली नृत्य किया जाता हैं।
  • इनके गुरू बालीनाथ थे।
  • इनके ‘‘पगल्ये’’ पूजे जाते हैंे।
  • इनके रात्री जागरण को ‘‘जम्मा’’ कहते हैं।
  • इनकी ध्वजा नेजा कहलाती हैं, जो सफेद और पचरंगी होती हैं।
  • ये राजस्थान के एकमात्र देवता थे जो साहित्यकार भी हैं।
  • इन्होने ‘‘24 बाणियां’’ (सामाजिक बुराईयों पर) नामक पुस्तक लिखि थी।
  • इनके भक्त रखियां कहलाते हैं।
  • इनका मेला भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वितीया से दषमी तक भरता हैं।
  • इनके प्रसिद्ध मन्दिर रूणीचा (जैसलमेर), मसुरिया (जोधपुर), बिराटियां (अजमेर), सुरताखेड़ा (चित्तौड़गढ़), छोटा रामदेवरा (गुजरात) हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
पाबुजी:-
  • जन्म 1341 विक्रम सम्वत् मंे फलौदी के कोलूमंड़ गांव में हुआ।
  • ये राठौड़ वंष के थे।
  • माता का नाम कमलादे एवं पिता का नाम धांधल।
  • पत्नी का नाम सुप्यारदे।
  • देवल चारणी की गायों को अपने बहनोई जिंदराज खींची से बचातें हुए प्राण त्यागे।
  • देवल चारणी ने अपनी घोड़ी केसर कालमी पाबूजी को दी थी। चांदा, डेमा और हरमल पाबूजी के सहयोगी थे।
  • पाबुजी को लक्ष्मण का अवतार मानते हैं।
  • इनके जन्म मृत्यु के दिन लोकगाथा ‘‘पाबुजी के पावड़े’’ गाये जाते हैं।
  • रेबारी (राइका, नाइक, थोरी) जाति के अराध्य देवता हैं।
  • प्रमुख पुस्तक ‘‘पाबु प्रकाष’’ हैं। इसके लेखक ‘‘आंसिया मोड़जी’’ हैं।
  • पाबूजी की फड़ सर्वांधिक लोकप्रिय फड़ हैं।
  • इसकी मूल प्रतिलिपि वर्तमान में जर्मनी के संग्रहालय में रखी हुई हैं।
  • फड़ गाते समय रावणहत्था बजाया जाता हैं।
  • मेला चैत्र अमावस्या को भरता हैं।
  • पाबूजी प्लेग और ऊँटो के रक्षक देवता के रूप में पूजे जाते हैं, क्योंकि जब भी ऊँट बीमार होता हैं तब इनकी फड़ बांची जाती हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
हड़बुजी:-
  • जन्म नागौर के भूड़ेल गांव में हुआ। पिता का नाम मेहाजी सांखला।
  • इनका कार्यस्थल बैगंटी रहा। इनकी गाड़ी की पूजा की जाती हैं।
  • क्योंकि यह बैलगाड़ी से लावारिस पशुओं के लिए चारा लाते थे।
  • हड़बुजी रामदेवजी के मौसेरे भाई थे।
  • इन्होने रामदेवजी के समाज-सुधार के कार्यों को पूरा करने का प्रयास किया था।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
देवनारायण जी:-
  • जन्म स्थान भीलवाड़ा के आंसिद गांव में सम्वत् 1300 में हुआ।
  • पिताजी संवाई भोज एवं माता सेडू खटाणी।
  • यह गुर्जर बगड़ावत वंष के थे।
  • बचपन का नाम उदयसिंह।
  • पत्नी पीपलदे, जो मध्यप्रदेष के धार के शासक जयसिंह की पुत्री थी।
  • विष्णु का अवतार माना जाता हैं।
  • इनकी फड़ सबसे लम्बी हैं जो 35 5 हैं।
  • इनकी फड़ पर भारत सरकार के द्वारा 5 रु का टिकट भी जारी किया जा चुका हैें।
  • भाद्र शुक्ल छठ और सप्तमी को मेला भरता हैं।
  • इनका प्रमुख मंदिर आंसिद (भीलवाड़ा), देवधाम जोधपुरिया (टोंक), देवडूंगरी (चित्तौड़गढ़) और देवमाली (ब्यावर) में हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
मेहाजी:-
  • मारवाड़ के लोकदेवता।
  • मांगलिया (राजपूत) जाति के अराध्य देव हैं।
  • इन्हे पंचपीरों में गिना जाता हैं, घोड़ा किरड़ काबरा हैं।
  • इनका मेला जोधपुर के बापणी गांव में कृष्ण जन्माष्टमी को भरता हैं।
  • जैसलमेर के रांणगदेव से युद्ध करते हुए शहीद हुए।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
भूरिया बाबा:-
  • यह गोमतेष्वर के नाम से जाने जाते हैें।
  • यह मारवाड़ (गोड़वाड़) के मीणा जाति के आराध्य देव हैं।
  • दक्षिण राजस्थान के मीणा कभी भी इनकी झूठी कसम नहीं खाते हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
मल्लीनाथजी:-
  • जन्म 1358 . सन् में हुआ।
  • पिता का नाम तीड़ाजी एवं माता का नाम जाणीदेव।
  • इन्होने निजामुद्दीन की सेना को परास्त किया था।
  • इनका मेला चैत्र कृष्ण एकादषी से पन्द्रह दिन तक लूणी नदी के किनारे तिलवाड़ा (बाड़मेर) नामक स्थान पर पशु मेला भरता हैं।
  • यह मेला मल्लीनाथजी के राज्याभिषेक के अवसर से वर्तमान तक आयोजित हो रहा हैं।
  • बाड़मेर का गुड़ामलानी का नामकरण मल्लीनाथजी के नाम पर ही हुआ हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
कल्लाजी:-
  • इनका जन्म मेड़ता (सामियाना) में हुआ था।
  • मीराबाई इनकी बुआ थी।
  • चित्तौड़ के तीसरे शाके (1567) में मुगल अकबर की सेना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
  • यह चार हाथ वाले लोकदेवता हैें।
  • इनकी पूजा भूत-पिषाच से ग्रस्त व्यक्ति, पागल कुत्ते, विषैले नाग के काटने पर की जाती हैं।
  • इनकी मुख्य पीठ जालौर के रनैला गांव में हैं।
  • इन्हे शेषनाग का अवतार माना जाता हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
बिग्गाजी:-
  • जाखड़ समाज के इष्टदेव।
  • जन्म बीकानेर के रीढ़ी गांव में हुआ।
  • इन्होने मुस्लिम लुटेरों से गायों की रक्षा की।
  • डूंगरपुर के बिग्गा गांव में इनका मुख्य थान हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
झुंझारजी:-
  • इनका जन्म सीकर में हुआ था।
  • खेजड़ी के पेड़ के नीचे इनका निवास स्थान माना जाता हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
देवबाबा:-
  • इनका जन्म भरतपुर के नांगल गांव मंे हुआ था।
  • यह गुर्जर ग्वालों के अराध्य देव हैं।
  • इन्हे पशु चिकित्सा का अच्छा ज्ञान था।
  • इनका मेला भाद्रपद शुक्ल (सुदी) पंचमी एवं चैत्र सुदी पंचमी को भरता हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
मामादेव:-
  • मेवाड़ में बरसात के देवता के रूप में पूजे जाते हैं।
  • इनकी मूर्ति लकड़ी की होती हैं, जो मुख्य द्वार पर तोरण के रूप में एवं गांव के बाहर सड़क के किनारे रखी जाती हैं।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।
तल्लीनाथजी:-
  • यह राठौड़ वंषीय थे। इनका मुख्य मन्दिर पांचोटा पहाड़ी (जालौर) में पड़ता हैं।
  • इनके बचपन का नाम ‘‘गांग देव’’ था।
  • इनके गुरू जलन्धर ने इनका नाम तल्लीनाथ रखा था।
  • नोट:- निर्गुण निराकार ईष्वर के उपासक।

राजस्थान की प्रमुख लोक देवियां
करणी माता:-
  • यह बीकानेर के राठौड़ राजवंष की कुलदेवी हैं।
  • इनका मुख्य मन्दिर देषनोक में हैं।
  • यह ‘‘चूहों की देवी’’ के नाम से भी जानी जाती हैं।
  • चारण जाति (देपा) के लोग इनकी पूजा करते हैं।
  • चूहों को काबा कहते हैं।
  • मेला चैत्र अष्विन मास की शुक्ल एकम से नवमी तक भरता हैं।
जीणमाता:-
  • शाकम्भरी के चैहानों की कुल देवी हैं।
  • रेवासा गांव दांतारामगढ़ (सीकर) में अष्टभुजा रूपी प्रतिमा हैं।
  • मेला चैत्र अष्विन मास में भरता हैं।
  • नोट:- राजस्थान की लगभग सभी देवियों के मेले चैत्र या अष्विन मास
  • में भरते हैं।
शीतला माता:-
  • ‘‘सेढ़ल माता’’ एवं ‘‘चेचक की देवी’’ भी कहा जता हैं।
  • वाहन गधा हैं।
  • मन्दिर शीलडूंगरी की पहाड़ी, चाकसू (जयपुर) एवं संवाईमाधोपुर में हैें।
  • राजस्थान की एकमात्र देवी जो खंडित रूप में ूपजी जाती हैं।
  • बच्चों की संरक्षिका कहलाती हैं।
  • प्रतीक चिन्ह दीपक हैं।
  • पुजारी कुम्हार होते हैं।
  • मेला चैत्र कृष्ण पक्ष की सप्तमी एवं अष्टमी को भरता हैं।
कैलादेवी:-
  • करौली के यदुवंषियों की कुलदेवी हैं।
  • मुख्य मन्दिर करौली में त्रिकूट पर्वत पर हैें।
  • मेला चैत्र शुक्ल पक्ष की अष्टमी को भरता हैं।
  • भक्त इन्हें प्रसन्न करने के लिए लागुरियां नृत्य करते हैं।
  • मेले पर लाखों लोग आते हैं। इसलिए यह मेला लख्खी मेला कहलाता हैं।
षिलादेवी (अन्नपूर्णां देवी):-
  • यह जयुपर के कच्छावा राजवंष की कुलदेवी हैं।
  • इनकी मूर्ति आमरे शासक मानसिंह प्रथम पूर्वी बंगाल के विजय के दौरा महाराजा केदारनाथ से लाए थे।
  • 16 वीं. शताब्दी में इस मूर्ति को आमेर के राजभवन में स्थापित किया गया।
  • मूर्ति अष्टभुजी हैं।
आवड़माता:-
  • जैसलमेर के भाटी राजवंष की कुलदेवी हैंे।
  • मुख्यमन्दिर जैसलमेर के तेमड़ पर्वत पर हैं।
  • राजस्थान में ‘‘सुगनंचिड़ी’’ को आवड़ माता का रूप माना जाता हैं।
स्वांगिया माता:-
  • आवड़ माता का ही रूप हैं।
  • जैसलमेर के भाटी शासको की कुलदेवी हैं।
नागणेचीजी माता:-
  • जोधपुर के राठौड़ राजवंष की कुलदेवी हैं।
आवरी माता:-
  • इनका मंदिर चित्तौड़ में हैं
  • लकवे का इलाज करवाने वाले भक्त इनकी पूजा करते हैं।
नारायणी माता:-
  • मुख्य मंदिर अलवर में राजगढ़ तहसील के बरवा डूंगरी की पहाड़ी पर हैं।
  • मन्दिर प्रतिहार शैली में बना हुआ हैं।
  • मीणा जाति के लोग पुजारी हैं।
  • मीणा नाई जाति की विवादित देवी हैं।
ज्वाला माता:-
  • मंदिर जोबनेर में हैं।
  • यह खंगारोतो की कुल देवी हैं।
सच्चिया माता:-
  • ओसवाल समाज की कुल देवी हें।
  • मुख्य मंदिर ओंसिया (जोधपुर) में हैं।
  • यह मन्दिर प्रतिहार शैली में बना हैं।
  • मन्दिर नागभट्ट प्रथम द्वारा बनवाया गया।
तनोट माता:-
  • मुख्य मंदिर जैसलमेर के तनोट में हैं।
  • थार की वैष्णोंदेवी हैं।
  • सैनिकों की देवी हैं।
भदाणा माता:-
  • कोटा के हाड़ा शासकों की कुलदेवी हैं।
  • मूठ (तन्त्र-मन्त्र) की देवी हैं

अम्बिका माता:-
  • उदयपुर के जगत में मन्दिर हैं।
  • नोट:- जगत के मन्दिरों को मेवाड़ का खुजराहों कहा जात हैं।
बाणमाता:-
  • उदयपुर के सिसोदिया राजवंष की देवी है।
घेवरमाता:-
  • मन्दिर राजसमन्द है।
आषापुरी माता:-
  • जालौर के सोनगरा चैहानों की कुलदेवी है।
त्रिपुरा सुंदरी:-
  • मुख्य मंदिर बांसवाड़ा में हैं।
दधिमति माता:-
  • दाधीच ब्राह्यणों की कुलदेवी हैं।
  • मन्दिर गोठ मांगलोद (नागौर) में हैं।
चैथमाता:-
  • मुख्य मंदिर सवांईमाधोपुर में हैं।
सुगाली माता:-

  • आऊआ के ठाकुरों की कुलदेवी हैं।